गे सेक्स: दुनिया में कानून बदल रहे हैं, लेकिन इंसाफ आज भी सरहदों का मोहताज है
1 अप्रैल 2026

बहुत से लोगों को लगता है कि समलैंगिक रिश्तों (गे रिलेशन) को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई अब खत्म होने वाली है। ऐसा सोचना लाजमी भी है। पिछले 30 सालों में कई देशों के कोर्ट और संसदों ने अंग्रेजों के जमाने के कानूनों को खत्म किया है। उन्होंने प्राइवेसी के अधिकारों को माना है और लोगों को बराबरी का हक दिया है। लेकिन दुनिया भर की कानूनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। सबसे बड़ी बात यह नहीं है कि कुछ देशों में आज भी 'गे सेक्स' को अपराध माना जाता है। असल बात यह है कि सरहद पार करते ही इंसाफ के मायने तुरंत बदल सकते हैं। जिन देशों में ये कानून खत्म हो चुके हैं, वहां भी पुलिस की ताकत और लचर सिस्टम लोगों के मन में डर बनाए रखता है।
बदलाव का यह ट्रेंड सच है। 'इंटरनेशनल लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांस एंड इंटरसेक्स एसोसिएशन' के डेटा के मुताबिक, आज बहुत कम देश आपसी सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अपराध मानते हैं। 20वीं सदी के आखिर में हालात बहुत अलग थे। भारत, बोत्सवाना, एंटीगुआ और बारबुडा, बारबाडोस, डोमिनिका और सिंगापुर जैसे कई देशों में बड़े कानूनी बदलाव हुए हैं। इससे ऐसे देशों की लिस्ट छोटी हुई है। इसमें अदालतों ने बड़ी भूमिका निभाई है। भारत में 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। कोर्ट ने सहमति से बने समलैंगिक संबंधों पर धारा 377 के इस्तेमाल को खत्म कर दिया। कोर्ट ने इसे सम्मान, समानता और संवैधानिक नैतिकता का मुद्दा माना। बोत्सवाना में भी हाईकोर्ट ने 2019 में ऐसा ही फैसला सुनाया, जिसे 2021 में वहां की कोर्ट ऑफ अपील ने बरकरार रखा।
हालांकि, इन्हीं ग्लोबल सर्वे से पता चलता है कि दर्जनों देशों में आज भी इसके लिए सजा का प्रावधान है। कुछ देशों में इसके लिए लंबी जेल और शारीरिक सजा दी जाती है। कुछ बेहद सख्त कानूनी और धार्मिक नियमों वाले देशों में तो मौत की सजा तक का खतरा है। ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे मानवाधिकार समूहों ने बार-बार एक बात उठाई है। उन्होंने बताया है कि जहां इस कानून के तहत बहुत कम केस दर्ज होते हैं, वहां भी ये कानून लोगों पर भारी पड़ते हैं। ये पुलिस को परेशान करने का हथियार देते हैं। परिवारों को दबाव बनाने का मौका देते हैं। ये ब्लैकमेल करने वालों को डराने का एक पक्का जरिया देते हैं। साथ ही, ये कानून आम नागरिकों को बताते हैं कि समाज के एक खास तबके के पास कानूनी हक कम हैं।
यह कानूनी फर्क सिर्फ उन देशों के बीच नहीं है जो इसे अपराध मानते हैं और जो नहीं मानते। यह फर्क उन सिस्टम्स के बीच भी है जो कोर्ट में प्राइवेसी की रक्षा करते हैं और जो असल जिंदगी में रोजमर्रा के अपमान की छूट देते हैं। कुछ जगहों पर तो पुलिस को किसी की जिंदगी बर्बाद करने के लिए उसे दोषी साबित करने की भी जरूरत नहीं होती। गिरफ्तारी, हिरासत, समाज में बदनामी, नौकरी छूटना और रिश्वत देने का दबाव ही अपने आप में बड़ी सजा बन जाते हैं। 'UNAIDS' और 'ग्लोबल कमीशन ऑन एचआईवी एंड द लॉ' लंबे समय से एक बात कहते आ रहे हैं। उनका मानना है कि ऐसे कानूनों की वजह से लोग स्वास्थ्य सेवाओं, खासकर एचआईवी टेस्टिंग और इलाज से दूर हो जाते हैं। कई देशों में हुए रिसर्च बताते हैं कि सख्त कानूनों के कारण लोगों का सरकारी संस्थाओं से भरोसा उठ जाता है। आसान शब्दों में कहें तो कानून सिर्फ कोर्ट के फैसले तय नहीं करता, बल्कि यह भी तय करता है कि कोई व्यक्ति बिना डरे क्लिनिक जा पाएगा या पुलिस में शिकायत दर्ज करा पाएगा या नहीं।
इस कानूनी इतिहास की जड़ें काफी हद तक अंग्रेजी राज से जुड़ी हैं। आज भी लागू कई समलैंगिकता विरोधी कानून ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर से मिले हैं। धारा 377 और इसके जैसे दूसरे कानून ब्रिटेन से निकलकर दुनिया के कई हिस्सों में फैल गए। यही वजह है कि बिल्कुल अलग संस्कृति वाले देशों में भी ऐसे कानूनों की भाषा एक जैसी है। अब अदालतें इस पर गौर कर रही हैं। अंग्रेजी राज से आजाद हुए कई देशों के जजों ने इन कानूनों को नैतिकता का कोई अटल नियम नहीं माना है। इसके बजाय, उन्होंने इसे जनता पर कंट्रोल करने का एक ऐसा 'विदेशी हथियार' माना है जो आजादी के बाद भी कायम रहा। यह बात बहुत मायने रखती है क्योंकि इससे पूरी कहानी बदल जाती है। नेता अक्सर इन कानूनों को हटाने की मांग को पश्चिमी देशों का दबाव बताते हैं। लेकिन कई मामलों में सच इसके बिल्कुल उलट है। असल में, लोगों को अपराधी बनाने वाले कानून विदेश से आए थे और इन्हें हटाना अंग्रेजी मानसिकता से कानूनी आजादी पाने का एक हिस्सा है।
धर्म, दलीय राजनीति और कमजोर न्यायपालिका भी इन नतीजों पर असर डालती है। जिन देशों में नेता कामुकता (सेक्सुअलिटी) को राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक बना देते हैं, वहां ये कानून बड़े राजनीतिक हथियार बन जाते हैं। इससे सरकारों को खुद को परंपराओं का रक्षक बताने का मौका मिल जाता है। इसी बहाने वे भ्रष्टाचार, खराब अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र की नाकामी जैसे मुद्दों से जनता का ध्यान भी भटका देती हैं। युगांडा इसका सबसे साफ उदाहरण है। कई बार जब कोर्ट सख्त एलजीबीटी (LGBT) विरोधी कानूनों के कुछ हिस्सों पर रोक लगा भी देते हैं, तब भी इसका राजनीतिक असर बेहद डरावना होता है। नेताओं की नफरत भरी बयानबाजी से स्थानीय स्तर पर लोगों को निशाना बनाया जाता है। मकान मालिक ऐसे लोगों को किराए पर घर देने से मना कर देते हैं और कंपनियां उन्हें नौकरी से निकाल देती हैं। आम लोगों को यह समझ आ जाता है कि सिर्फ कानूनी हक उन्हें सरकारी मशीनरी की नफरत से नहीं बचा सकते।
इसकी कीमत सिर्फ ख्यालों में नहीं, बल्कि असल जिंदगी में चुकानी पड़ती है। अपराधी घोषित करने वाले कानून परिवारों को तोड़ सकते हैं और लोगों की रोजी-रोटी छीन सकते हैं। यह पूरे न्याय सिस्टम को भी बिगाड़ सकता है। जब पुलिस को लोगों की निजी जिंदगी और आपसी सहमति वाले रिश्तों को निशाना बनाने की छूट मिल जाती है, तो जांच और सबूतों के नियम अक्सर कमजोर पड़ जाते हैं। मानवाधिकार समूहों ने कई देशों में ऐसे मामले दर्ज किए हैं जहां लोगों के फोन खंगाले गए, उनके पर्सनल मैसेज को सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया गया, या फिर उन्हें ऑनलाइन जाल में फंसाकर गिरफ्तार किया गया। ये तरीके सिर्फ लोगों की निजता में दखल नहीं देते। ये पुलिस की एक ऐसी मनमानी को आम बात बना देते हैं जो सिर्फ सेक्सुअलिटी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि हर आम इंसान की प्राइवेसी के लिए खतरा बन जाती है।
जिन देशों ने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है, वहां भी आधी कानूनी जंग ही जीती गई है। एक इंसान भले ही अब अपने निजी रिश्तों के लिए जेल न जाए, लेकिन उसे अभी भी कई मोर्चों पर सुरक्षा नहीं मिली है। उसे वर्कप्लेस पर भेदभाव, मकान मिलने में दिक्कत या हेट क्राइम (नफरत से जुड़े अपराध) का सामना करना पड़ सकता है। पूर्वी यूरोप, अफ्रीका, एशिया और कैरेबियन देशों के कई हिस्सों में यह कमी आज भी बहुत बड़ी है। इसका नतीजा यह है कि एक तरह का 'दोहरा न्याय सिस्टम' बन गया है। पहला हिस्सा कहता है कि अब सरकार आपकी पहचान के लिए आपको सजा नहीं देगी। लेकिन दूसरा हिस्सा आपको समाज से अलग करने, परेशान करने या आपके खिलाफ हिंसा होने की चुपचाप छूट देता है और इसमें न्याय मिलने की गुंजाइश भी बहुत कम होती है। कानून और सुरक्षा के बीच की खाई अक्सर उतनी छोटी नहीं होती, जितना सरकारें दावा करती हैं।
इस समस्या का क्या हल है, यह अब साफ होने लगा है। आज़ाद अदालतें बहुत मायने रखती हैं। खास तौर पर तब, जब वे अपने फैसले सिर्फ कानूनी पेंच पर नहीं, बल्कि निजता, समानता और सम्मान के आधार पर सुनाती हैं। कानूनों को खत्म करने का फायदा तभी है जब इसके साथ ही कुछ जरूरी सुधार भी हों। जैसे- पुलिस को सही निर्देश दिए जाएं, ब्लैकमेलिंग से बचाव के नियम बनें, डिजिटल निगरानी पर रोक लगे और जजों तथा वकीलों को इसकी ट्रेनिंग दी जाए। कानूनी सुधारों में पब्लिक हेल्थ (जन स्वास्थ्य) के सबूतों को भी शामिल किया जाना चाहिए। जिन देशों की सरकारों ने सजा खत्म की और स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच बनाई, वहां हालात काफी बेहतर हुए हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और हेल्थ एजेंसियों ने पाया है कि वहां इलाज और लोगों तक पहुंचने की सुविधाएं अच्छी हुई हैं। इसमें क्षेत्रीय अदालतें और मानवाधिकार संगठन भी मदद कर सकते हैं। भले ही उनके फैसलों को पूरी तरह लागू न किया जाए, लेकिन वे एक कानूनी दबाव बनाते हैं। इससे स्थानीय कार्यकर्ताओं को एक आधार मिलता है जिसका इस्तेमाल वे अपने देश की अदालतों में कर सकते हैं।
विदेशी सरकारों को इस मुद्दे पर संभलकर चलना चाहिए, लेकिन उन्हें खामोश भी नहीं रहना चाहिए। जरूरत से ज्यादा ज्ञान देना अक्सर इस दावे को मजबूत करता है कि समान अधिकारों की मांग पश्चिमी देशों का एजेंडा है। उनका समर्थन तब ज्यादा असरदार होता है जब वे स्थानीय कानूनी सहायता समूहों को मजबूत करते हैं। वे जनहित याचिकाओं (PIL) के लिए फंड दें और खतरे में पड़े मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की रक्षा करें। जो लोग इन कानूनों को बदलते हैं, वे आमतौर पर कोई राजनयिक (डिप्लोमैट) नहीं होते। वे आम नागरिक, वकील, हेल्थ वर्कर और परिवार होते हैं। यही लोग अदालतों और सरकारों को यह मानने पर मजबूर करते हैं कि न्याय में देरी से इंसान को कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।
दुनिया बदल गई है, लेकिन अभी इतनी भी नहीं बदली है कि हम संतुष्ट होकर बैठ जाएं। जिन देशों में यह अपराध था, उनकी संख्या कम होना वाकई में तरक्की का संकेत है। इससे पता चलता है कि बुरे कानून, चाहे वे कितने भी पुराने और गहरे क्यों न हों, खत्म हो सकते हैं। लेकिन न्याय को सिर्फ कानून हटाने से नहीं मापा जा सकता। इसे इस बात से मापा जाना चाहिए कि क्या लोग गिरफ्तारी, ब्लैकमेलिंग, बदनामी या सरकारी बेइज्जती के डर के बिना जी सकते हैं। इस पैमाने पर देखें तो दुनिया का नक्शा आज भी उतना आधुनिक नहीं है जितना लोग मानते हैं। लाखों लोगों के लिए कानूनी अधिकार आज भी बहुत कमजोर हैं। एक देश से दूसरे देश की दूरी का मतलब आज भी प्राइवेसी और जेल के बीच का फासला हो सकता है।