जब 'होर्मुज स्ट्रेट' पर खतरा होता है, तब दुनिया के लिए ईरान सबसे अहम क्यों हो जाता है
1 अप्रैल 2026

बहुत से लोगों को लगता है कि ईरान दुनिया भर में तेल सप्लाई करने के कारण अहम है। लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है, और न ही यह सबसे अहम बात है। ईरान का सबसे बड़ा प्रभाव इसके तेल उत्पादन से नहीं, बल्कि इसकी लोकेशन से आता है। ईरान के एक तरफ फारस की खाड़ी (Persian Gulf) है। इसके मुहाने पर होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) है। यह जहाजों के गुजरने का एक संकरा रास्ता है, जिसका कोई दूसरा विकल्प दुनिया के पास नहीं है। जब भी यहां तनाव बढ़ता है, तो मिडिल ईस्ट से दूर बैठे व्यापारियों, सरकारों और आम लोगों को भी इसका असर महसूस होता है।
इसके पीछे के आंकड़े इसे और साफ करते हैं। अमेरिकी एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) ने कई बार होर्मुज स्ट्रेट को दुनिया का सबसे अहम ऑयल चोकपॉइंट बताया है। हाल के सालों में, रोजाना करीब 2 करोड़ बैरल तेल और पेट्रोलियम लिक्विड यहां से गुजरा है। यह दुनिया की कुल खपत का करीब 20 प्रतिशत है। यह रास्ता गैस के लिए भी बेहद जरूरी है। दुनिया के सबसे बड़े LNG (तरल प्राकृतिक गैस) निर्यातकों में से एक कतर भी अपना ज्यादातर LNG इसी रास्ते से भेजता है। इसका मतलब है कि ईरान के समुद्री इलाके में कोई भी रुकावट सिर्फ तेल की कीमतों को ही नहीं बढ़ाएगी। इससे गैस मार्केट में भी संकट आ सकता है। खासतौर पर यूरोप और एशिया में, जहां इंडस्ट्रीज अब भी LNG आयात पर निर्भर हैं।
ईरान का अपना तेल निर्यात भी मायने रखता है, लेकिन लोगों की सोच से कम। प्रतिबंधों (sanctions) के कारण ईरान अक्सर अपनी क्षमता से कम तेल बेच पाता है। समय के साथ इसके उत्पादन में उतार-चढ़ाव आया है, लेकिन OPEC देशों में ईरान अब भी एक बड़ा उत्पादक है। हालांकि, राजनीति, शिपिंग के खतरों और पेमेंट की समस्याओं के कारण इसका निर्यात सीमित रहता है। आसान शब्दों में कहें तो मार्केट को ईरान की डायरेक्ट सप्लाई से ज्यादा चिंता किसी बड़े झटके की होती है। मार्केट को ईरान के हर बैरल तेल की कमी से उतना डर नहीं लगता, जितना इस बात से लगता है कि खाड़ी देशों में संघर्ष फैलने पर क्या होगा।
यह डर इतिहास से भी जुड़ा है। 1980 के दशक के 'टैंकर वॉर' के दौरान खाड़ी में जहाजों पर हमले हुए थे। तब ईरान-इराक युद्ध का असर एनर्जी ट्रेड पर पड़ा था। 2019 में, होर्मुज स्ट्रेट के पास टैंकरों पर हमले हुए। सऊदी अरब की तेल सुविधाओं पर ड्रोन हमले भी हुए। इन घटनाओं ने दिखाया कि इलाके का तनाव कितनी जल्दी सप्लाई को खतरे में डाल सकता है। सऊदी अरब के अबकैक (Abqaiq) पर हुए हमले के कारण कुछ समय के लिए रोजाना करीब 57 लाख बैरल तेल का उत्पादन रुक गया था। यह घटना ईरान में नहीं हुई थी। लेकिन इसने एनर्जी मार्केट को एक बात साफ कर दी कि खाड़ी देश एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। किसी एक जगह सुरक्षा का खतरा हर जगह तेल की कीमतें बढ़ा सकता है।
इस क्षेत्र की अहमियत की वजह बहुत सीधी है। सऊदी अरब और UAE जैसे खाड़ी देशों के पास जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त तेल उत्पादन की बड़ी क्षमता है। दुनिया का कुछ सबसे सस्ता तेल भी यहीं से आता है। चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी एशियाई अर्थव्यवस्थाएं खाड़ी के कच्चे तेल पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं। 2022 से यूरोप ने रूस की गैस पर अपनी निर्भरता कम की है। इसके लिए उसने ज्यादा LNG खरीदना शुरू किया है। लेकिन इसका कुछ हिस्सा अब भी ईरान के पास के समुद्री रास्तों से होकर आता है। इसलिए एक एनर्जी रिस्क से बचने की कोशिश कर रहे देश दूसरे रिस्क में फंस सकते हैं। एनर्जी सिक्योरिटी का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि ईंधन कौन बना रहा है। इसका मतलब यह भी है कि वह ईंधन सुरक्षित रूप से अपनी मंजिल तक पहुंच सकता है या नहीं।
इसके विकल्प मौजूद हैं, लेकिन वे काफी सीमित हैं। सऊदी अरब के पास ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन है। यह पूर्वी तेल क्षेत्रों से लाल सागर (Red Sea) तक कच्चा तेल ले जाती है। UAE के पास अबू धाबी से फुजैराह तक एक पाइपलाइन है, जो होर्मुज स्ट्रेट के बाहर है। ये रास्ते मदद तो करते हैं, लेकिन होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले तेल की पूरी भरपाई नहीं कर सकते। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) और मार्केट के जानकारों का मानना है कि ये दूसरे रास्ते खाड़ी के कुल निर्यात के लिए काफी नहीं हैं। अगर जहाजों की आवाजाही में बड़ी रुकावट आती है, तो कुछ तेल पाइपलाइन से भेजा जा सकता है। लेकिन फिर भी एक बड़ी कमी बनी रहेगी। यही वजह है कि सप्लाई रुकने से पहले ही, सिर्फ खतरे की सुगबुगाहट से कीमतें बढ़ जाती हैं।
इसके नतीजे सिर्फ तेल के व्यापारियों तक सीमित नहीं रहते। तेल की कीमतें बढ़ने से ट्रांसपोर्ट, खाने-पीने की चीजें, मैन्युफैक्चरिंग और फ्लाइट्स महंगी हो जाती हैं। घर का बजट भी बिगड़ जाता है। पिछले ऑयल शॉक्स पर हुई रिसर्च दिखाती है कि एनर्जी की ज्यादा कीमतों से महंगाई बढ़ती है और विकास दर धीमी हो जाती है। गरीब और तेल आयात करने वाले देशों में इसका नुकसान और ज्यादा होता है। सरकारों को सब्सिडी पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है। बिजली कंपनियों को ईंधन के लिए ज्यादा पैसे देने पड़ते हैं। आम परिवारों पर बिजली और ट्रांसपोर्ट का बोझ बढ़ जाता है। 2022 में दुनिया ने देखा कि कैसे एनर्जी संकट तुरंत राजनीतिक संकट में बदल सकते हैं। इससे उन देशों में भी महंगाई, जनता का गुस्सा और बजट की समस्या बढ़ जाती है, जिनका मुख्य सप्लाई रिस्क से कोई सीधा लेना-देना नहीं होता।
ईरान इसलिए भी अहम है क्योंकि वह क्षेत्र के व्यापक संतुलन के केंद्र में बैठा है। अगर कूटनीति में सुधार होता है और प्रतिबंध हटते हैं, तो ईरान का कच्चा तेल वापस फॉर्मल मार्केट में आ सकता है। इससे सप्लाई बढ़ेगी और कीमतों को काबू में रखने में मदद मिलेगी। लेकिन अगर तनाव बढ़ता है, तो इसका उल्टा होता है। शिपिंग का इंश्योरेंस महंगा हो जाता है। टैंकरों के रास्ते महंगे हो जाते हैं। खरीदार दूसरे विकल्प तलाशने लगते हैं। भले ही होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह बंद न हो, फिर भी मार्केट में दबाव आ सकता है। व्यापार धीमा, ज्यादा जोखिम भरा और महंगा हो जाता है। एनर्जी मार्केट में तो सिर्फ डर की भी अपनी एक कीमत होती है।
इसीलिए असली सवाल यह नहीं है कि क्या दुनिया सिर्फ ईरान के तेल के बिना काम चला सकती है। सवाल यह है कि क्या दुनिया ईरान के आसपास शांति के बिना काम चला सकती है। ये दोनों अलग-अलग बातें हैं। पहला काम मुश्किल है लेकिन नामुमकिन नहीं, क्योंकि दुनिया में कहीं और अतिरिक्त क्षमता और रणनीतिक भंडार मौजूद हैं। लेकिन दूसरा काम बहुत मुश्किल है, क्योंकि किसी देश की लोकेशन (geography) पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। संघर्ष वाले इलाके के बगल में मौजूद यह संकरा जलमार्ग हमेशा ग्लोबल इकॉनमी की एक बड़ी कमजोरी बना रहेगा।
इससे निपटने का तरीका कोई रहस्य नहीं है, लेकिन इसमें धैर्य की जरूरत है। आयात करने वाले देशों को सप्लाई के और स्रोत, ज्यादा स्टोरेज और मजबूत इमरजेंसी प्लान चाहिए। रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार आज भी मायने रखते हैं। साथ ही, LNG के दूसरे विकल्पों, नई पाइपलाइनों और मजबूत पावर ग्रिड में निवेश जरूरी है, ताकि बिजली बनाने में तेल की जरूरत कम हो। इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से अपनाकर इस निर्भरता को कम किया जा सकता है। दुनिया हर दिन जितना कम तेल जलाएगी, किसी एक चोकपॉइंट का महंगाई और विकास पर असर उतना ही कम होगा।
इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ कूटनीति भी उतनी ही जरूरी है। सुरक्षित समुद्री रास्तों के लिए आपसी तालमेल, नौसेनाओं का सहयोग और उन देशों के बीच लगातार बातचीत जरूरी है जो एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करते। दुनिया ने बार-बार देखा है कि एनर्जी मार्केट कई समस्याओं को झेल सकता है। लेकिन जब किसी एक ही जगह पर भौगोलिक अहमियत, आपसी टकराव और डर एक साथ मिलते हैं, तो मार्केट के लिए मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं।
इसलिए ग्लोबल एनर्जी में ईरान की जगह सिर्फ उसके निर्यात के आंकड़ों से कहीं ज्यादा बड़ी है। हां, वह एक तेल उत्पादक है, लेकिन इससे भी बढ़कर वह ग्लोबल ट्रेड के सबसे संवेदनशील रास्तों में से एक का पहरेदार (gatekeeper) है। यही वजह है कि ईरान दुनिया की एनर्जी सप्लाई के केंद्र में बना हुआ है। इसलिए नहीं कि तेल का हर बैरल ईरान से आता है, बल्कि इसलिए क्योंकि दुनिया का बहुत सारा अहम तेल इसके पास से होकर गुजरता है।