कोर्ट ने कहा -:जब कुछ लोगों को नियमित किया तो सूची पेश क्यों नहीं की गई
27 अप्रैल 2026

मप्र में वर्षों से नियमितीकरण की मांग कर रहे दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के मामले में राज्य सरकार अब कानूनी और प्रशासनिक दोनों मोर्चों पर घिरती नजर आ रही है। जबलपुर हाई कोर्ट ने सरकार से उन दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों की पूरी सूची 4 मई तक तलब की है, जिन्हें नियमित किया गया है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि दैनिक वेतन से नियमित किए गए कर्मचारियों का विभागवार डाटा जुटाना मुश्किल है। 2016 में तत्कालीन शिवराज सिंह चौहान सरकार ने इन कर्मचारियों को नियमित नहीं किया और स्थाई कर्मी का नाम दे दिया। इसके बाद यह मामला और पेचीदा हो गया। अब उच्च न्यायालय ने सरकार से यह भी पूछा है कि बाकी पात्र कर्मचारियों के मामलों में अब तक क्या कार्रवाई हुई। दैनिक वेतन कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष गोकुल राय की अवमानना याचिका पर हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सख्त रुख दिखाते हुए पूछा- जब कुछ लोगों को नियमित किया गया तो सूची पेश क्यों नहीं की गई? हाल ही ही हुई सुनवाई में सरकार की ओर से करीब 10 वकीलों की टीम कोर्ट में मौजूद रही और रिकॉर्ड पेश करने के लिए समय मांगा गया। मामले की अगली सुनवाई 4 मई से शुरू होने वाले सप्ताह में होगी। सरकार ने बहाली की, शेष शर्तों का पालन नहीं किया यह सिर्फ नौकरी का विवाद नहीं, बल्कि 26 साल पुराना रोजगार, न्याय और प्रशासनिक वादाखिलाफी का मामला बन चुका है। मप्र दैनिक वेतन कर्मचारी महासंघ के महामंत्री राशिद खान ने बताया कि वर्ष 2000 में करीब 28 हजार दैनिक वेतनभोगी कर्मियों को सेवा से बाहर किया गया था। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर हुईं। बाद में 31 जनवरी 2004 को लोक अदालत में समझौता हुआ, जिसमें कर्मचारियों को बहाल करने और नियमितीकरण की दिशा में कार्रवाई का रास्ता तय हुआ। सरकार ने बहाली तो कर दी, लेकिन शेष शर्तों का पालन नहीं किया। इसलिए दायर की गई अवमानना याचिका हाईकोर्ट ने 27 फरवरी 2024 को आदेश दिया था कि पात्र कर्मचारियों को नियुक्ति दिनांक से वित्तीय लाभ देते हुए 120 दिन के भीतर नियमित किया जाए। आरोप है कि तय समयसीमा में आदेश का पालन नहीं हुआ, इसलिए अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी। इन विभागों पर असर? यह मामला पीडब्ल्यूडी, पीएचई, जल संसाधन, नगर निगम, स्थानीय निकाय और अन्य विभागों में कार्यरत हजारों कर्मचारियों से जुड़ा है। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो 10 से 25 साल से सेवा दे रहे हैं, लेकिन अब भी अस्थायी दर्जे में हैं। राज्य सरकार के सामने अब 4 बड़े सवाल अगली सुनवाई में सरकार को बताना पड़ सकता है- कितने कर्मचारी पात्र हैं? किन विभागों ने सूची बनाई? कितनों का परीक्षण हुआ? अब तक कितनों का नियमितीकरण हुआ? कोर्ट में जवाब देना नहीं, विभागवार डेटा जुटाना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब सिर्फ कोर्ट में जवाब देना नहीं, बल्कि विभागवार वास्तविक डेटा जुटाना है। यदि सूची और अनुपालन रिपोर्ट नहीं आई तो अदालत सख्त रुख अपना सकती है। यह मामला हजारों कर्मचारियों की नौकरी सुरक्षा, पेंशन, वेतनमान और भविष्य से जुड़ा है। इसलिए प्रदेश के लाखों परिवारों की नजर अब अगली सुनवाई पर टिकी है।
Source: bhaskar_hindi