'न लाइसेंस, न पछतावा; रील के चक्कर में ली जान', द्वारका हिट एंड रन में नाबालिग की बेल के विरोध में मां की दलील

17 अप्रैल 2026

'न लाइसेंस, न पछतावा; रील के चक्कर में ली जान', द्वारका हिट एंड रन में नाबालिग की बेल के विरोध में मां की दलील

द्वारका कोर्ट में साहिल धनेशरा की मौत के मामले में नाबालिग आरोपी को मिली जमानत के खिलाफ सुनवाई हुई। मृतक की मां ने दलील दी कि नाबालिग आदतन अपराधी है, रील बनाते समय उसने तेज रफ्तार से गाड़ी चलाई, और उसे कोई पछतावा नहीं है।

द्वारका में एक तेज रफ्तार कार से जान गंवाने वाले 23 वर्षीय युवक की माँ ने किशोर न्याय बोर्ड द्वारा आरोपी नाबालिग को दी गई जमानत का विरोध करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया है। माँ ने अपनी याचिका में दलील दी है कि यह घटना केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के लिए रील बनाने के जुनून में की गई एक घोर लापरवाही थी, जिसके लिए आरोपी में कोई पछतावा नहीं है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जो अब सोमवार को सुनाया जाएगा।

यह मामला इसी साल फरवरी का है, जब द्वारका साउथ थाना क्षेत्र में मोटरसाइकिल पर जा रहे 23 वर्षीय साहिल धनेशरा को एक तेज रफ्तार एसयूवी ने टक्कर मार दी थी। टक्कर इतनी भीषण थी कि साहिल की मौके पर ही मौत हो गई। जांच में पता चला कि कार एक नाबालिग चला रहा था, जिसके पास ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं था और वह अपनी बहन के साथ कथित तौर पर गाड़ी में रील बना रहा था। हादसे के बाद आरोपी ने मौके से भागने की कोशिश की, लेकिन स्थानीय लोगों ने उसे पकड़ लिया था।

किशोर न्याय बोर्ड ने आरोपी को जमानत दे दी थी, जिसे मृतक की मां ने अब एक उच्च अदालत में चुनौती दी है। मृतक की मां की ओर से पेश हुए वकील ने अदालत में तर्क दिया कि बोर्ड ने साक्ष्यों को नजरअंदाज करते हुए जमानत दी है। उन्होंने कहा कि जिस कार से दुर्घटना हुई, उस पर पहले से ही ओवर-स्पीडिंग और बिना लाइसेंस के ड्राइविंग के कई चालान लंबित थे, जो यह साबित करता है कि नाबालिग आदतन नियमों का उल्लंघन करता था और इसमें उसके परिवार की भी मौन सहमति थी। याचिका में यह भी कहा गया है कि आरोपी को अपनी करतूत पर कोई पछतावा नहीं है और जमानत देते समय पीड़ित पक्ष को नोटिस तक नहीं दिया गया।

यह मामला सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि पाने के लिए युवाओं द्वारा उठाए जाने वाले खतरनाक कदमों की एक और दुखद मिसाल है। यह घटना उन माता-पिता की जिम्मेदारी पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है जो अपने नाबालिग बच्चों को बिना लाइसेंस के वाहन चलाने की अनुमति देते हैं। मोटर वाहन अधिनियम के तहत, यदि कोई नाबालिग वाहन चलाते हुए पकड़ा जाता है, तो उसके अभिभावक या वाहन के मालिक को तीन साल तक की जेल और 25,000 रुपये का जुर्माना हो सकता है। साथ ही, वाहन का पंजीकरण भी रद्द किया जा सकता है।

अब सभी की निगाहें सोमवार को आने वाले अदालत के फैसले पर टिकी हैं। अदालत यह तय करेगी कि क्या नाबालिग आरोपी को वापस सुधार गृह भेजा जाना चाहिए या उसकी जमानत बरकरार रहेगी। यह फैसला भविष्य में इस तरह की घटनाओं से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है, जहां सोशल मीडिया की लत और नाबालिगों द्वारा की जाने वाली घोर लापरवाही के कारण किसी की जान चली जाती है। इस मामले ने एक बार फिर juvenile justice कानून की प्रासंगिकता और गंभीर अपराधों में नाबालिगों की जवाबदेही पर एक राष्ट्रव्यापी बहस छेड़ दी है।

Source: jagran

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The World Dispatch

Source: World News API