उत्तराखंड में कैसे हो स्वगणना, बीच में धोखा दे रहा है सर्वर; आमजन को हो रही परेशानी
17 अप्रैल 2026
उत्तराखंड में स्वगणना प्रक्रिया धीमी पड़ गई है, खासकर पिछले दो दिनों से सर्वर ठीक से काम नहीं कर रहा है।
उत्तराखंड में सरकार की डिजिटल इंडिया पहल को उस समय झटका लगता दिख रहा है, जब नागरिक संपत्ति कर के स्व-गणना यानी सेल्फ-असेसमेंट के लिए बनाए गए ऑनलाइन पोर्टल के साथ जूझ रहे हैं। देहरादून, हरिद्वार और नैनीताल जैसे प्रमुख शहरों में हजारों लोग इस प्रणाली से परेशान हैं क्योंकि सर्वर लगातार खराब चल रहा है। यह समस्या ऐसे समय में और गंभीर हो गई है जब संपत्ति कर जमा करने की अंतिम तिथि नजदीक आ रही है, जिससे आम जनता में भारी चिंता और आक्रोश है।
सरकार द्वारा कुछ समय पहले इस स्व-गणना पोर्टल की शुरुआत बड़े जोर-शोर से की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य संपत्ति कर के आकलन और भुगतान की प्रक्रिया को पारदर्शी, सरल और सुलभ बनाना था, ताकि नागरिक घर बैठे आसानी से अपना कर जमा कर सकें। इस प्रणाली से यह उम्मीद की गई थी कि यह नगर निगमों के कामकाज में सुधार लाएगी और कर संग्रह को बढ़ावा देगी। शुरुआत में इस पहल की सराहना भी हुई, लेकिन तकनीकी खामियों के कारण अब यह प्रणाली नागरिकों के लिए सुविधा की जगह असुविधा का कारण बन गई है।
वर्तमान स्थिति यह है कि जब नागरिक पोर्टल पर अपनी संपत्ति का विवरण दर्ज करने की कोशिश करते हैं, तो वेबसाइट या तो बहुत धीमी गति से चलती है या बीच प्रक्रिया में ही बंद हो जाती है। कई मामलों में, भुगतान के अंतिम चरण में पहुंचने पर सर्वर डाउन हो जाता है, जिससे लेन-देन अधूरा रह जाता है और नागरिकों के मन में पैसे कट जाने का डर बना रहता है। इस तकनीकी गड़बड़ी ने लोगों को नगर निगम कार्यालयों के चक्कर काटने पर मजबूर कर दिया है, जो इस डिजिटल प्रणाली के मूल उद्देश्य के ही खिलाफ है। आम लोगों का कहना है कि ऑनलाइन सुविधा के नाम पर उन्हें घंटों बर्बाद करने पड़ रहे हैं।
इस पूरी अव्यवस्था के लिए शहरी विकास निदेशालय और संबंधित नगर निगमों की जवाबदेही बनती है। हालांकि अभी तक अधिकारियों की ओर से कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है, लेकिन लोगों के बढ़ते दबाव को देखते हुए यह उम्मीद की जा रही है कि विभाग इस समस्या को जल्द स्वीकार करेगा। नागरिकों और विभिन्न सामाजिक संगठनों की मांग है कि या तो सर्वर की क्षमता को तत्काल बढ़ाया जाए या फिर कर जमा करने की अंतिम तिथि को आगे बढ़ाया जाए ताकि लोगों को जुर्माना न भरना पड़े।
यदि इस समस्या का जल्द ही कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला गया, तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। इस तरह की तकनीकी विफलताएं न केवल सरकारी प्रणालियों में जनता के विश्वास को कम करती हैं, बल्कि 'डिजिटल उत्तराखंड' की संकल्पना पर भी सवाल खड़े करती हैं। संभावित अगले कदमों में सरकार द्वारा अंतिम तिथि को बढ़ाना और एक हेल्पलाइन स्थापित करना शामिल हो सकता है, जहाँ नागरिक अपनी समस्याओं का समाधान पा सकें। दीर्घकालिक समाधान के लिए, सरकार को अपने आईटी ढांचे को मजबूत करने और भविष्य में ऐसी किसी भी ऑनलाइन सेवा को शुरू करने से पहले उसकी व्यापक जांच सुनिश्चित करनी होगी।
Source: jagran