'EWS एससी-एसटी और ओबीसी जैसी छूट के हकदार नहीं', दिल्ली HC ने आयु में छूट और अतिरिक्त मौकों की मांग ठुकराई

17 अप्रैल 2026

'EWS एससी-एसटी और ओबीसी जैसी छूट के हकदार नहीं', दिल्ली HC ने आयु में छूट और अतिरिक्त मौकों की मांग ठुकराई

दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार की सीधी भर्तियों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के उम्मीदवारों के लिए आयु में छूट और अतिरिक्त प्रयासों की मांग को खारिज कर दिया है।

नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के उम्मीदवार, अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की तरह सरकारी नौकरियों में आयु सीमा में छूट और अतिरिक्त प्रयासों के हकदार नहीं हैं। अदालत ने इस मांग को लेकर दायर की गई याचिकाओं को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि ईडब्ल्यूएस श्रेणी को मिली आरक्षण व्यवस्था की तुलना सामाजिक और ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को दिए गए लाभों से नहीं की जा सकती। यह फैसला केंद्र सरकार की सीधी भर्तियों और रोजगार के संबंध में भविष्य की चयन प्रक्रियाओं के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर स्थापित करता है।

अदालत ने यह निर्णय ईडब्ल्यूएस श्रेणी के कई उम्मीदवारों द्वारा दायर याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई करते हुए दिया। इन उम्मीदवारों ने अपनी याचिका में केंद्र सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के ज्ञापनों और संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा जारी परीक्षा अधिसूचनाओं को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह था कि जब संविधान (103वां संशोधन) अधिनियम, 2019 के माध्यम से उन्हें 10 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है, तो एससी, एसटी और ओबीसी उम्मीदवारों की तरह आयु में छूट और परीक्षा में बैठने के अतिरिक्त अवसर जैसे सहायक लाभ भी प्रदान किए जाने चाहिए। उनका कहना था कि इन लाभों के बिना, आरक्षण का उद्देश्य पूरी तरह से सफल नहीं हो पा रहा है।

न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति अमित महाजन की पीठ ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण का आधार केवल आर्थिक पिछड़ापन है, जबकि एससी, एसटी और ओबीसी श्रेणियों के लिए आरक्षण का आधार पीढ़ियों से चला आ रहा गहरा सामाजिक, शैक्षिक और संरचनात्मक भेदभाव है। फैसले में कहा गया कि जाति आधारित भेदभाव के साथ एक स्थायी सामाजिक कलंक जुड़ा होता है, जबकि आर्थिक स्थिति परिवर्तनशील हो सकती है। न्यायालय ने माना कि इन दोनों प्रकार की वंचनाओं की तुलना नहीं की जा सकती है और इसलिए, ईडब्ल्यूएस श्रेणी स्वतः ही एससी/एसटी/ओबीसी के साथ समानता का दावा नहीं कर सकती।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि विधायिका ईडब्ल्यूएस उम्मीदवारों की स्थिति से अवगत थी और इसीलिए उनके लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया। हालांकि, आयु और प्रयासों में छूट न देने का केंद्र सरकार का नीतिगत निर्णय मनमाना या असंवैधानिक नहीं है। मौजूदा नियमों के तहत, यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा जैसी भर्तियों में एससी/एसटी उम्मीदवारों को ऊपरी आयु सीमा में पांच साल और ओबीसी उम्मीदवारों को तीन साल की छूट मिलती है, साथ ही उन्हें अतिरिक्त प्रयास भी दिए जाते हैं। अदालत के इस फैसले ने यह स्थापित कर दिया है कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण केवल सीटों के प्रतिशत तक ही सीमित रहेगा।

इस निर्णय का देश भर में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे लाखों ईडब्ल्यूएस उम्मीदवारों पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा। यह फैसला केंद्र सरकार की उस स्थिति को मजबूत करता है कि विभिन्न आरक्षित श्रेणियों के लिए अलग-अलग लाभ प्रदान किए जा सकते हैं और यह समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है। अब यह लगभग तय हो गया है कि भविष्य की केंद्रीय भर्तियों में ईडब्ल्यूएस उम्मीदवारों को आयु में कोई अतिरिक्त छूट नहीं मिलेगी। हालांकि, याचिकाकर्ताओं के पास इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने का विकल्प खुला है, लेकिन फिलहाल उच्च न्यायालय का यह निर्णय ही प्रभावी कानून बना रहेगा।

Source: jagran

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The World Dispatch

Source: World News API