बिहार के विश्वविद्यालयों की लापरवाही: 13 लाख से अधिक डिग्रियां समर्थ पोर्टल पर नहीं, 1 महीने का अल्टीमेटम
17 अप्रैल 2026
बिहार के विश्वविद्यालयों ने 13 लाख से अधिक डिग्रियां समर्थ पोर्टल पर अपलोड नहीं की हैं, जिससे छात्रों को ऑनलाइन सत्यापन में परेशानी हो रही है। सरकारी नौकरी पाने वाले अभ्यर्थियों को विशेष दिक्कतें आ रही हैं।
बिहार के विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक लापरवाही का एक बड़ा मामला सामने आया है, जहां 13 लाख से अधिक छात्रों की डिग्रियां समर्थ पोर्टल पर अपलोड नहीं की गई हैं। इस गंभीर चूक पर संज्ञान लेते हुए, राज्यपाल सह कुलाधिपति ने सभी संबंधित विश्वविद्यालयों को एक महीने के भीतर इन सभी लंबित डिग्रियों और अंकपत्रों को पोर्टल पर अपलोड करने का सख्त अल्टीमेटम दिया है। यह कदम उन हजारों छात्रों के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है, जिन्हें अपनी डिग्रियों के सत्यापन के लिए विश्वविद्यालयों के चक्कर काटने पड़ रहे थे।
समर्थ पोर्टल भारत सरकार की एक महत्वपूर्ण डिजिटल पहल है, जिसे उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रशासनिक कार्यों को सुव्यवस्थित और पारदर्शी बनाने के लिए विकसित किया गया है। इस पोर्टल का उद्देश्य नामांकन, परीक्षा प्रबंधन, शुल्क भुगतान और प्रमाणपत्र सत्यापन जैसी प्रक्रियाओं को ऑनलाइन करना है। डिग्रियों को डिजिटल रूप में उपलब्ध कराने से न केवल सत्यापन प्रक्रिया तेज होती है, बल्कि यह फर्जी प्रमाणपत्रों के गोरखधंधे पर भी रोक लगाने में मदद करता है। बिहार के विश्वविद्यालयों को भी इसी व्यवस्था के तहत डिग्रियां अपलोड करनी थीं, लेकिन कई निर्देशों के बावजूद ऐसा नहीं किया गया।
आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों की कुल 13 लाख 18 हजार से अधिक डिग्रियां अपलोड होनी बाकी हैं। इस लापरवाही का सबसे बड़ा खामियाजा उन छात्रों को भुगतना पड़ रहा है, जिनका चयन सरकारी नौकरियों में हो गया है या जो उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने की तैयारी में हैं। डिग्रियों का ऑनलाइन सत्यापन न हो पाने के कारण उनकी नियुक्ति और नामांकन प्रक्रिया बाधित हो रही है। यह स्थिति न केवल छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि यह राज्य की उच्च शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
राजभवन ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। उच्च शिक्षा विभाग द्वारा राज्यपाल सह कुलाधिपति, लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन को स्थिति से अवगत कराए जाने के बाद यह कठोर कदम उठाया गया। कुलपतियों को दिए गए निर्देश में स्पष्ट कहा गया है कि यदि एक महीने की समय सीमा के भीतर सभी डिग्रियां पोर्टल पर अपलोड नहीं की गईं, तो संबंधित विश्वविद्यालयों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। इसमें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से मिलने वाले फंड में कटौती जैसी कार्रवाई भी शामिल हो सकती है।
अब सभी विश्वविद्यालयों पर इस अल्टीमेटम को पूरा करने का भारी दबाव है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस चुनौती से कैसे निपटता है। इस कदम से यह उम्मीद की जा रही है कि भविष्य में डिग्रियों को समय पर अपलोड करने की एक स्थायी व्यवस्था बनेगी, जिससे छात्रों को डिग्री सत्यापन के लिए किसी भी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े और बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके।
Source: jagran