CBSE के 'दो बोर्ड' वाले प्लान को झटका, पहली परीक्षा के नतीजों ने बदला मूड; क्यों पीछे हट रहे हैं छात्र?

17 अप्रैल 2026

CBSE के 'दो बोर्ड' वाले प्लान को झटका, पहली परीक्षा के नतीजों ने बदला मूड; क्यों पीछे हट रहे हैं छात्र?

सीबीएसई 10वीं बोर्ड परीक्षा में बेहतर परिणामों के बाद छात्र दूसरी परीक्षा से पीछे हट रहे हैं। 'बेस्ट ऑफ टू' नियम के कारण अच्छे अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी अतिरिक्त तैयारी के दबाव से बचना चाहते हैं।

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) द्वारा इसी शैक्षणिक सत्र से शुरू की गई दो-चरणीय बोर्ड परीक्षा प्रणाली को लेकर शुरुआती उत्साह अब शांत होता दिख रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की सिफारिशों के तहत छात्रों पर से परीक्षा का दबाव कम करने के उद्देश्य से इस साल कक्षा 10 के लिए दो बार बोर्ड परीक्षा का विकल्प पेश किया गया था। फरवरी-मार्च में पहली अनिवार्य परीक्षा के आयोजन और अप्रैल में उसके परिणाम घोषित होने के बाद, अब मई में होने वाली वैकल्पिक सुधार परीक्षा के प्रति छात्रों में अपेक्षा से कम रुचि दिखाई दे रही है, जिसने इस महत्वाकांक्षी योजना के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इस योजना को एक बड़े सुधार के रूप में प्रस्तुत किया गया था, जिसका मूल उद्देश्य छात्रों को 'एक परीक्षा सब कुछ तय करेगी' वाली मानसिकता के तनाव से मुक्ति दिलाना था। इसके तहत, पहली मुख्य परीक्षा के बाद छात्रों को यह अवसर दिया गया कि यदि वे अपने प्रदर्शन से संतुष्ट नहीं हैं, तो वे अधिकतम तीन विषयों में अपने अंक सुधारने के लिए दूसरी परीक्षा दे सकते हैं। बोर्ड का मानना था कि इससे छात्रों को अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का एक और मौका मिलेगा और उन्हें किसी एक दिन के खराब प्रदर्शन के कारण साल बर्बाद करने की चिंता नहीं सताएगी।

हालांकि, 15 अप्रैल के आसपास जब पहली बोर्ड परीक्षा के परिणाम घोषित हुए, तो तस्वीर कुछ और ही बनती दिखाई दी। परिणामों के विश्लेषण से पता चलता है कि बड़ी संख्या में छात्रों ने पहली ही परीक्षा में संतोषजनक या उससे बेहतर अंक हासिल किए हैं। इसके चलते, सुधार परीक्षा के लिए आवेदन करने वाले छात्रों की संख्या में अपेक्षित उत्साह नहीं दिख रहा है। कई स्कूलों और छात्रों का मानना है कि जब पहली परीक्षा के अंकों के आधार पर ही 11वीं कक्षा में अनंतिम प्रवेश मिल रहा है, तो फिर से पूरे पाठ्यक्रम की पढ़ाई कर दोबारा परीक्षा देने का अतिरिक्त दबाव क्यों लिया जाए।

छात्रों के इस बदलते मूड के पीछे कई व्यावहारिक कारण हैं। सबसे प्रमुख कारण यह है कि दोनों ही परीक्षाओं के लिए पूरा पाठ्यक्रम निर्धारित है। ऐसे में कुछ अंकों के सुधार के लिए पूरे साल का सिलेबस दोबारा दोहराना छात्रों को एक थकाऊ प्रक्रिया लग रही है। इसके बजाय, वे अपना ध्यान अब 11वीं कक्षा की पढ़ाई और भविष्य की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पर केंद्रित करना चाहते हैं। अभिभावक भी यह महसूस कर रहे हैं कि सुधार परीक्षा की तैयारी में लगने वाला समय और ऊर्जा अगली कक्षा की नींव को कमजोर कर सकती है।

अब सबकी निगाहें सीबीएसई के अगले कदम पर टिकी हैं। बोर्ड को इस बात का मूल्यांकन करना होगा कि सुधार परीक्षा के लिए कितने छात्र वास्तव में आवेदन करते हैं। छात्रों की यह शुरुआती प्रतिक्रिया इस नीति के कार्यान्वयन के लिए एक महत्वपूर्ण फीडबैक है। यह संभव है कि बोर्ड आने वाले वर्षों में हितधारकों से मिले इस अनुभव के आधार पर अपनी 'दो बोर्ड' परीक्षा की रणनीति में कुछ बदलाव करे। फिलहाल, अधिकांश छात्र और स्कूल पहली परीक्षा के नतीजों के साथ आगे बढ़ते हुए नए शैक्षणिक सत्र की तैयारियों में जुट गए हैं।

Source: jagran

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The World Dispatch

Source: World News API