राजगंज में 'विकास' के नाम पर विनाश की नींव? प्रखंड कार्यालय के लिए 18 एकड़ भूमि के बीच में खोदा जा रहा तालाब

17 अप्रैल 2026

राजगंज में 'विकास' के नाम पर विनाश की नींव? प्रखंड कार्यालय के लिए 18 एकड़ भूमि के बीच में खोदा जा रहा तालाब

धनबाद के राजगंज में पलटन टांड़ मैदान में तालाब नवीनीकरण को लेकर विवाद गहरा गया है। यह 18 एकड़ भूमि भविष्य के प्रशासनिक कार्यालयों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।

धनबाद जिले के राजगंज में विकास की एक परियोजना ने भविष्य की प्रशासनिक योजनाओं पर सवालिया निशान लगा दिया है। राजगंज के ऐतिहासिक 'पलटन टांड़' मैदान में, जो लगभग 18 एकड़ में फैला है, एक तालाब का नवीनीकरण कार्य शुरू किया गया है, जिसको लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह कदम उस बेशकीमती जमीन को खंडित करने की एक सोची-समझी साजिश है, जिसे लंबे समय से राजगंज के नए प्रखंड सह अंचल कार्यालय के निर्माण के लिए सबसे उपयुक्त स्थान माना जाता रहा है।

विवाद का केंद्र वह भूमि है जिसे राजगंज के भविष्य के 'पावर सेंटर' के रूप में देखा जाता है। बाजार के बीचों-बीच और जीटी रोड से सटा होने के कारण यह भूखंड प्रशासनिक भवनों के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। आसपास की दर्जनों पंचायतों के निवासियों के लिए यहां पहुंचना सुगम है। वर्षों से स्थानीय लोग राजगंज को प्रखंड का दर्जा देने की मांग करते आ रहे हैं, और यह 18 एकड़ का मैदान इस सपने को साकार करने के लिए एकमात्र उपलब्ध और उपयुक्त भूमि है। ग्रामीणों का आरोप है कि इस जमीन के ठीक बीच में तालाब का निर्माण करके इसे जानबूझकर बांटा जा रहा है, ताकि भविष्य में किसी बड़े सरकारी भवन के निर्माण के लिए पर्याप्त जगह ही न बचे।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला पहलू जिला परिषद सदस्य बानी देवी की भूमिका है। उन्होंने ही पिछले बुधवार को इस तालाब नवीनीकरण कार्य का शिलान्यास किया था। विडंबना यह है कि बानी देवी स्वयं लंबे समय से 'राजगंज को प्रखंड बनाओ' मुहिम की एक प्रमुख अगुआ रही हैं। उन्होंने इस मांग को लेकर कई बार विरोध प्रदर्शनों और रैलियों का नेतृत्व किया है और सरकार तक मांग पत्र भी पहुंचाया है। ऐसे में उन्हीं के द्वारा इस परियोजना का उद्घाटन करना लोगों को हैरान कर रहा है और इसे लेकर कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं। यह विरोधाभास प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।

परियोजना के शिलान्यास में पारदर्शिता का घोर अभाव भी देखने को मिला। कार्यक्रम को इतने गुपचुप तरीके से अंजाम दिया गया कि पंचायत के किसी अन्य जनप्रतिनिधि या स्थानीय पत्रकारों तक को इसकी भनक नहीं लगी। जिला परिषद सदस्य और ठेकेदारों ने अकेले ही शिलापट्ट का अनावरण कर दिया, जिससे इस कार्य की मंशा पर संदेह और भी गहरा गया है। स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि राजगंज में पानी की कोई खास किल्लत नहीं है और पहले से ही कई सोलर जल मीनारें चालू हालत में हैं।

लोगों को यह भी याद है कि पहले भी इसी स्थान पर तालाब खोदने की कोशिश की गई थी, जो प्रशासनिक लापरवाही के कारण असफल रही और सरकारी धन बर्बाद हो गया था। आज वह जगह कीचड़ से भरे एक गड्ढे में तब्दील हो चुकी है। अब उसी विफलता को दोहराते हुए, 'विकास' के नाम पर एक ऐसी योजना को आगे बढ़ाया जा रहा है जो राजगंज के दशकों पुराने प्रशासनिक विकास के सपने को नष्ट कर सकती है। स्थानीय निवासी इस अदूरदर्शी कदम का विरोध कर रहे हैं और भविष्य की बलि देकर वर्तमान की इस संदिग्ध योजना पर सवाल उठा रहे हैं।

Source: jagran

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The World Dispatch

Source: World News API