'भारत का अंदरूनी मामला': MEA ने परिसीमन बिल में PoK के प्रावधान पर पाकिस्तान की आपत्ति खारिज की
17 अप्रैल 2026
MEA के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि परिसीमन भारत का अंदरूनी मामला है। उन्होंने कहा कि भारत इसमें किसी भी तरह की दखलअंदाजी की कोशिश को खारिज करता है।
भारत सरकार ने शुक्रवार को पाकिस्तान की आपत्तियों को सख्ती से खारिज कर दिया। यह आपत्ति एक नए कानून को लेकर थी, जिसमें पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के लिए प्रावधान हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि देश की कानूनी प्रक्रियाएं उसका अपना मामला है। उन्होंने जोर देकर कहा, "भारत के अंदरूनी मामले, भारत के अंदरूनी मामले हैं।" मंत्रालय ने बाहरी पक्षों द्वारा घरेलू मामलों में दखल देने या टिप्पणी करने की किसी भी कोशिश को खारिज कर दिया है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत इस राजनयिक विरोध के बावजूद अपने एजेंडे पर आगे बढ़ेगा।
यह विवाद परिसीमन विधेयक, 2026 (Delimitation Bill, 2026) को लेकर है, जिसे हाल ही में भारत की संसद में पेश किया गया था। इस प्रस्तावित कानून का एक अहम प्रावधान भारत के चुनाव आयोग को एक कानूनी ढांचा देता है। इसके तहत आयोग जम्मू-कश्मीर के उस इलाके में चुनावी क्षेत्रों का सीमांकन कर सकता है, जो अभी पाकिस्तानी प्रशासन के अधीन है। यह प्रावधान तब लागू होगा जब यह क्षेत्र कब्जे से मुक्त हो जाएगा। यह कानूनी कदम भारत की पुरानी संवैधानिक और राजनीतिक स्थिति की पुष्टि करता है। इसके अनुसार, पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों समेत पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने ऐतिहासिक रूप से PoK के लिए 24 सीटें आरक्षित और खाली रखी हैं।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बिल पेश होने पर तुरंत प्रतिक्रिया दी और इस कदम को सिरे से खारिज कर दिया। इस्लामाबाद में मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने इस परिसीमन प्रक्रिया को "अवैध" और "राजनीति से प्रेरित" बताया। पाकिस्तान सरकार इस बिल को एक ऐसे क्षेत्र के राजनीतिक और आबादी के स्वरूप को बदलने की कोशिश के रूप में देखती है, जिसे वह विवादित मानती है। उसका दावा है कि इस कदम की कोई कानूनी वैधता नहीं है। यह रुख पाकिस्तान के पिछले रवैये जैसा ही है, जब उसने जम्मू-कश्मीर की परिसीमन रिपोर्टों को खारिज किया था। 2022 में भी ऐसा ही एक राजनयिक विवाद हुआ था।
जम्मू-कश्मीर में चुनावी सीमाओं को फिर से बनाने की प्रक्रिया 2019 से ही चर्चा का विषय रही है। यह तब शुरू हुआ जब इस क्षेत्र का विशेष स्वायत्त दर्जा खत्म कर दिया गया और इसे एक केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। मार्च 2020 में विधानसभा और संसदीय क्षेत्रों को फिर से व्यवस्थित करने के लिए एक परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) का गठन किया गया था। यह भविष्य में चुनाव कराने के लिए एक जरूरी कदम था। पूर्व राज्य में इस तरह का आखिरी परिसीमन 1995 में हुआ था, जो 1981 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित था। मौजूदा बिल इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है। यह औपचारिक रूप से PoK को भारत की चुनावी प्रणाली में एकीकृत करने का कानूनी रास्ता बनाता है।
यह राजनयिक खींचतान दोनों परमाणु-सशस्त्र पड़ोसियों के बीच पहले से ही तनावपूर्ण संबंधों को और जटिल बनाती है। 2025 में सैन्य झड़पों के बाद से तनाव काफी बढ़ गया था। हालांकि दूसरे मोर्चों पर फिर से बातचीत के कुछ संकेत मिले हैं, लेकिन भारत का यह कानूनी कदम उसकी संप्रभुता के दावे को और मजबूत करता है। इस पर बाहरी टिप्पणियों का असर पड़ने की संभावना नहीं है। जैसे-जैसे यह बिल भारत की कानूनी प्रक्रिया से आगे बढ़ेगा, उम्मीद है कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी आपत्तियां उठाता रहेगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि कश्मीर का दर्जा क्षेत्रीय भू-राजनीति में एक अहम और विवादास्पद मुद्दा बना रहेगा।
Source: firstpost