'बिजली कनेक्शन मौलिक अधिकार का हिस्सा, इससे वंचित नहीं किया जा सकता', हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

17 अप्रैल 2026

'बिजली कनेक्शन मौलिक अधिकार का हिस्सा, इससे वंचित नहीं किया जा सकता', हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कहा है कि बिजली कनेक्शन प्राप्त करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्थापित किया है कि बिजली का कनेक्शन पाना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए जीवन के मौलिक अधिकार का एक अभिन्न हिस्सा है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी भी नागरिक को बिजली जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह एक सम्मानजनक जीवन जीने के लिए आवश्यक है। यह निर्णय न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने प्रीति शर्मा नामक एक महिला द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।

यह मामला एक पारिवारिक विवाद से उत्पन्न हुआ था, जिसमें याचिकाकर्ता प्रीति शर्मा अपने ससुराल के घर में रह रही थीं। उनके ससुराल वालों ने उन्हें घर से निकालने के इरादे से उनका बिजली कनेक्शन कटवा दिया था, जबकि वह नियमित रूप से बिलों का भुगतान कर रही थीं। इसके बाद जब उन्होंने अपने नाम से एक नए कनेक्शन के लिए आवेदन किया, तो बिजली विभाग ने उनके आवेदन को अस्वीकार कर दिया। इसी अस्वीकृति के खिलाफ उन्होंने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जहाँ उन्होंने दलील दी कि वह 20 से अधिक वर्षों से उस घर में रह रही हैं और उनके छोटे बच्चे भी हैं, जिनके लिए बिजली अत्यंत आवश्यक है।

अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि बिजली सिर्फ एक सुविधा नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन की एक मूलभूत आवश्यकता है। इसके बिना बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। न्यायालय ने माना कि किसी परिसर में कानूनी रूप से रहने वाले व्यक्ति को, चाहे वह किरायेदार हो या परिवार का सदस्य, बिजली कनेक्शन से केवल इसलिए वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि संपत्ति के स्वामित्व को लेकर कोई विवाद है। अदालत ने कहा कि बिजली तक पहुंच एक सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार को प्रभावी बनाती है और इसे घरेलू विवादों में एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

इस फैसले के दूरगामी प्रभाव होंगे, क्योंकि यह बिजली वितरण कंपनियों को यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करता है कि वे मनमाने ढंग से कनेक्शन देने से इनकार न करें। यह उन हजारों लोगों के लिए एक बड़ी राहत है जो किराये के मकानों में रहते हैं या संपत्ति के विवादों में फंसे हुए हैं और अक्सर मकान मालिकों द्वारा उन्हें परेशान करने के लिए बिजली जैसी आवश्यक सेवाओं से वंचित कर दिया जाता है। यह निर्णय इस सिद्धांत को पुष्ट करता है कि बिजली का अधिकार संपत्ति के स्वामित्व से नहीं, बल्कि परिसर में वैध रूप से रहने के अधिकार से जुड़ा है।

इस मामले में, उच्च न्यायालय ने बिजली विभाग द्वारा पारित अस्वीकृति आदेश को रद्द कर दिया और अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे चार सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को एक नया बिजली कनेक्शन प्रदान करें। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कनेक्शन देने के लिए विभाग याचिकाकर्ता से एक उचित बांड ले सकता है। यह निर्णय भारत के विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा दिए गए पिछले कई फैसलों के अनुरूप है, जिन्होंने लगातार यह माना है कि बिजली का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक विस्तारित पहलू है।

Source: jagran

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The World Dispatch

Source: World News API