195 में सिर्फ 9... जानिए जिस न्यूक्लियर बम की आग में पूरी दुनिया झुलस रही, वो किन देशों के पास है?
16 अप्रैल 2026
Number of Nuclear Bombs in World: पूरी दुनिया में 195 देश हैं, जिनमें से महज 9 मुल्कों के पास परमाणु बम हैं. आखिर ये 9 मुल्क कौन से हैं, जिनके पास मौजूद संहारक बम पूरी दुनिया को बर्बादी की आग में झुलसा सकते हैं.
मौजूदा दौर में जहां पूरी दुनिया एक दूसरे से जुड़ी हुई है, वहीं एक कड़वा सच यह भी है कि पूरी मानवता को खत्म करने की ताकत सिर्फ मुट्ठी भर देशों के हाथों में सिमटी हुई है। दुनिया के लगभग 195 देशों में से केवल नौ देश ऐसे हैं जिनके पास परमाणु बम की विनाशकारी शक्ति मौजूद है। ये नौ देश संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, पाकिस्तान, भारत, इज़राइल और उत्तर कोरिया हैं। इन देशों के पास कुल मिलाकर 12,000 से अधिक परमाणु हथियार होने का अनुमान है, जो किसी भी समय पूरी पृथ्वी को एक गहरे संकट में डाल सकते हैं।
परमाणु युग की शुरुआत द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुई जब अमेरिका ने 1945 में पहला परमाणु बम विकसित किया और जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर इसका इस्तेमाल किया। इस घटना ने दुनिया को परमाणु हथियारों की भयावहता से परिचित कराया और एक खतरनाक दौड़ को जन्म दिया। इसके बाद, 1949 में तत्कालीन सोवियत संघ (अब रूस) ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया। आने वाले वर्षों में, इस क्लब में यूनाइटेड किंगडम (1952), फ्रांस (1960) और चीन (1964) भी शामिल हो गए। यही पांच देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य भी हैं।
इन पांच देशों के अलावा चार अन्य राष्ट्रों ने भी परमाणु क्षमता हासिल की है, लेकिन उनकी परिस्थितियां अलग हैं। भारत ने 1974 में अपना पहला "शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट" किया, जिसके जवाब में पड़ोसी देश पाकिस्तान ने भी अपने परमाणु कार्यक्रम को गति दी और 1998 में सफल परीक्षण किए। वहीं, उत्तर कोरिया ने परमाणु अप्रसार संधि से 2003 में खुद को अलग कर लिया और तब से कई परमाणु परीक्षण कर चुका है। आठ देशों के विपरीत, इज़राइल ने कभी भी सार्वजनिक रूप से अपने परमाणु कार्यक्रम को स्वीकार नहीं किया है, लेकिन यह व्यापक रूप से माना जाता है कि उसके पास भी परमाणु हथियारों का भंडार है।
परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए 1970 में परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) लागू की गई थी। इस संधि का उद्देश्य परमाणु हथियारों और प्रौद्योगिकी के फैलाव को रोकना, परमाणु निरस्त्रीकरण को बढ़ावा देना और परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग में सहयोग करना है। इस संधि के तहत, 1967 से पहले परमाणु परीक्षण करने वाले पांच देशों को परमाणु-शक्ति संपन्न राज्यों के रूप में मान्यता दी गई, जबकि बाकी सदस्य देशों को ऐसे हथियार विकसित करने से रोका गया। हालांकि, यह संधि सार्वभौमिक नहीं बन पाई क्योंकि भारत, पाकिस्तान और इज़राइल जैसे देशों ने इसे भेदभावपूर्ण मानते हुए कभी इस पर हस्ताक्षर नहीं किए।
आज दशकों बाद भी परमाणु हथियारों का खतरा कम नहीं हुआ है। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद हथियारों में कमी आने के बजाय, सभी नौ परमाणु-सशस्त्र देश अपने ज़खीरे का आधुनिकीकरण कर रहे हैं। कुल परमाणु हथियारों का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ रूस और अमेरिका के पास है। हाल के वर्षों में बढ़े भू-राजनीतिक तनावों ने इस चिंता को और भी गहरा कर दिया है कि इन हथियारों का इस्तेमाल दोबारा हो सकता है। यह स्थिति दुनिया को एक ऐसे अनिश्चित संतुलन पर खड़ा करती है, जहां इन नौ देशों में से किसी एक की भी चूक पूरी मानवता के लिए विनाशकारी परिणाम ला सकती है।
Source: zeenews