सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, पत्नी का भरण-पोषण सम्मानजनक जीवन के अनुरूप होना चाहिए

16 अप्रैल 2026

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, पत्नी का भरण-पोषण सम्मानजनक जीवन के अनुरूप होना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पति का अपनी पत्नी का भरण-पोषण करना प्राथमिक कर्तव्य है, ताकि वह गरिमापूर्ण जीवन जी सके। कोर्ट ने भरण-पोषण की राशि 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह कर दी।

नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में इस बात पर जोर दिया है कि पति का अपनी पत्नी को भरण-पोषण प्रदान करने का दायित्व एक प्राथमिक और निरंतर कर्तव्य है। अदालत ने स्पष्ट किया कि गुजारा भत्ता केवल एक दिखावा मात्र नहीं होना चाहिए, बल्कि यह इतना पर्याप्त होना चाहिए कि पत्नी सम्मान और गरिमा के साथ जीवन व्यतीत कर सके। यह राशि पत्नी के वैवाहिक जीवन के दौरान उसके जीवन स्तर के अनुरूप होनी चाहिए, ताकि उसे अलगाव के बाद किसी भी प्रकार की वित्तीय कठिनाई का सामना न करना पड़े।

यह ऐतिहासिक टिप्पणी न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की। इस मामले में एक महिला ने गुजारा भत्ता बढ़ाने की मांग की थी। युगल का विवाह मई 2023 में हुआ था, लेकिन एक वर्ष के भीतर ही उनके संबंधों में खटास आ गई और पत्नी को ससुराल छोड़कर अपने माता-पिता के घर लौटना पड़ा। उसने आरोप लगाया कि उसे ससुराल में उपेक्षा और शारीरिक तथा मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। आय का कोई स्वतंत्र स्रोत न होने के कारण, महिला ने भरण-पोषण के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।

इस मामले की यात्रा निचली अदालतों से शुरू हुई। उत्तराखंड के चंपावत की एक पारिवारिक अदालत ने शुरू में पत्नी के लिए 8,000 रुपये प्रति माह का गुजारा भत्ता तय किया था। इस राशि से असंतुष्ट होकर, महिला ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में अपील की, जिसने राशि को बढ़ाकर 15,000 रुपये प्रति माह कर दिया। हालांकि, महिला का मानना था कि यह राशि भी उसके सम्मानजनक जीवनयापन के लिए अपर्याप्त है, जिसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा। सर्वोच्च न्यायालय ने मामले के तथ्यों और पति की वित्तीय क्षमता का आकलन करते हुए गुजारा भत्ते की राशि को 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह कर दिया।

अपने फैसले में, सर्वोच्च न्यायालय ने इस सिद्धांत को रेखांकित किया कि भरण-पोषण की राशि का निर्धारण निष्पक्ष और उचित होना चाहिए। यह पति की वित्तीय क्षमता और दोनों पक्षों की सामाजिक स्थिति के अनुरूप होना चाहिए। अदालत ने एक महत्वपूर्ण अवलोकन करते हुए कहा कि पति द्वारा अपनी संपत्ति बनाने के लिए लिए गए ऋण की किस्तों (ईएमआई) जैसी स्वैच्छिक कटौतियों को पत्नी के भरण-पोषण के वैधानिक दायित्व पर प्राथमिकता नहीं दी जा सकती। अदालत के अनुसार, यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि गुजारा भत्ता यथार्थवादी हो और पत्नी को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करे, लेकिन साथ ही यह पति पर अत्यधिक बोझ भी न डाले।

इस फैसले से भविष्य के वैवाहिक विवादों और गुजारा भत्ता के मामलों पर दूरगामी प्रभाव पड़ने की संभावना है। यह निर्णय अदालतों के लिए एक स्पष्ट मार्गदर्शक के रूप में काम करेगा कि वे भरण-पोषण की राशि तय करते समय केवल आय ही नहीं, बल्कि जीवन स्तर और गरिमा जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर भी विचार करें। यह फैसला इस बात को पुष्ट करता है कि कानूनी और नैतिक रूप से, पति अपनी पत्नी की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के अपने कर्तव्य से आसानी से बच नहीं सकता, भले ही वैवाहिक संबंध समाप्त हो गए हों। यह महिलाओं को अलगाव के बाद एक स्थिर और सम्मानजनक जीवन जीने में मदद करने की दिशा में एक प्रगतिशील कदम है।

Source: jagran

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The World Dispatch

Source: World News API