'किसी भी राज्य के साथ नहीं होगा अन्याय', परिसीमन पर PM मोदी ने दक्षिण के राज्यों से किया वादा
16 अप्रैल 2026
प्रधानमंत्री मोदी ने महिला आरक्षण विधेयक पर विपक्ष की परिसीमन संबंधी चिंताओं को दूर किया। उन्होंने आश्वासन दिया कि किसी भी राज्य, विशेषकर दक्षिणी राज्यों के साथ अन्याय नहीं होगा और सीटों के अनुपात में छेड़छाड़ नहीं की जाएगी।
आगामी लोकसभा परिसीमन को लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों द्वारा व्यक्त की जा रही गहरी चिंताओं के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आश्वासन दिया है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से निष्पक्ष होगी और किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया है कि सीटों के बंटवारे में किसी भी क्षेत्र, चाहे वह उत्तर हो या दक्षिण, के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी भी राज्य का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम न हो। यह बयान उस राजनीतिक बहस को शांत करने का एक प्रयास है जो 2026 के बाद होने वाले परिसीमन को लेकर तेज हो गई है।
परिसीमन, या निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण, एक संवैधानिक प्रक्रिया है जो यह सुनिश्चित करती है कि प्रत्येक नागरिक के वोट का मूल्य लगभग समान रहे। भारत में, लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर तय की गई थी और 1976 में एक संवैधानिक संशोधन द्वारा इसे 2026 तक के लिए स्थिर कर दिया गया था। ऐसा इसलिए किया गया ताकि जो राज्य परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक लागू कर रहे हैं, उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व के नुकसान का डर न हो। अब जब यह रोक समाप्त होने वाली है, तो 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आधार पर एक नए परिसीमन की उम्मीद है, जिससे सीटों का पुनर्वितरण होगा।
इस संभावित पुनर्वितरण ने दक्षिण भारत के राज्यों में चिंता की लहर दौड़ा दी है। तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों ने पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। उनकी मुख्य चिंता यह है कि यदि परिसीमन पूरी तरह से जनसंख्या के आंकड़ों पर आधारित होता है, तो उत्तर भारत के अधिक आबादी वाले राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार को लोकसभा में काफी अधिक सीटें मिलेंगी, जबकि दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व आनुपातिक रूप से कम हो जाएगा। दक्षिणी नेताओं का तर्क है कि यह एक तरह से बेहतर प्रदर्शन के लिए सजा और जनसंख्या नियंत्रण में विफलता के लिए इनाम जैसा होगा, जिससे देश के संघीय ढांचे में शक्ति का संतुलन बिगड़ सकता है।
यह मुद्दा केवल लोकसभा में सीटों की संख्या तक ही सीमित नहीं है। इसका प्रभाव केंद्र से राज्यों को मिलने वाले वित्तीय आवंटन पर भी पड़ सकता है, क्योंकि वित्त आयोग अक्सर अपनी सिफारिशों के लिए जनसंख्या को एक महत्वपूर्ण मानदंड के रूप में उपयोग करता है। दक्षिणी राज्यों का देश की जीडीपी में महत्वपूर्ण योगदान है और उन्हें डर है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी से राष्ट्रीय नीति-निर्माण में उनकी आवाज कमजोर हो सकती है और उनके आर्थिक हितों की अनदेखी हो सकती है। इसी संदर्भ में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और अन्य दक्षिणी नेताओं ने इस पर कड़ा विरोध जताया है।
प्रधानमंत्री मोदी का आश्वासन इस संवेदनशील मुद्दे पर केंद्र सरकार के रुख को स्पष्ट करता है। उन्होंने संकेत दिया है कि सरकार एक ऐसे फार्मूले की तलाश कर सकती है जो सभी राज्यों के हितों का ध्यान रखे, शायद सीटों की संख्या में समानुपातिक वृद्धि करके ताकि किसी भी राज्य की मौजूदा सीटों की संख्या कम न हो। अब सभी की निगाहें भविष्य के परिसीमन आयोग के गठन और उसे दिए जाने वाले दिशा-निर्देशों पर टिकी हैं। यह प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ती है, यह न केवल भारत के चुनावी मानचित्र को फिर से परिभाषित करेगा, बल्कि केंद्र-राज्य संबंधों और देश के संघीय ताने-बाने के भविष्य को भी आकार देगा।
Source: jagran